रविवार, 23 अक्टूबर 2022

रावण ने जब फूलन देवी का अपहरण किया...

 बात उन दिनों की है जब रावण तक बात पहूंची की चम्बल में एक नारी है। वह बड़ी ही बलवती है, और ना जाने कितने पुरूषों का संघार कर चुकी है। शायद कोई पुरुष नही बचा घोर कलयुग में,इसीलिए हे रावण तुम जाओ अपनी जैसी ही नारी का अपहरण करो। क्या पता तुम्हारे अपहरण कृत्य को कुछ राहत मिले!  रावण: पर एक प्रश्न है ! पिछली बार तो लंका नगरी भस्म हो गई थी इस बार तो ऐसा नही होगा ना? उत्तर: अब हर कोई सीता तो नही होता न! रावण: फिर ठीक है! अब रावण भी सोचने लगा कि अवसर अच्छा है,वरना आज तक सीता के अपहरण के लिए बदनाम हो गया हूं! चलो इसी बहाने...

जाने से पहले सुनो रावण ! वो कलियुगी नारी है,उसके पास बंदूक है। उसे यह भी मालूम है कि तुम्हारे नाभि में अमृत है। तो तुम भेष बदल लो! तुम एक भद्र पुरुष सा दिखने वाले नर का रूप लो। यानी कोई उसी के जैसा! सुनो रावण दान वान वो देती नही तो साधु बनने की कोशिश न करना। और जबरन भी न करना ,वरना सीधी गोली तुम पर ही जाएगी। और अपना स्वर्ण महल थोड़ा realistic बनाओ और इसे e-house का रूप दो।  और रावण बेचारा सोचने लगा की इससे तो सीता ही भली थी। जो भी था अपहरण तो कर ही लिया था! ये तो कोई अदभुद नारी है! 

इसी वैचारिक ऊहापोह में, वह योजना बनाने लगा - कैसे सफ़ल योजना बनाई जाए ? अब कोई फॉर्मूला निकालता हूं । हां आइडिया! बोलूंगा बीहड़ से दूर हे सुंदर नारी,एक बड़ी ही अदभुद जगह है । तुम रानी बन के रहोगी और ये डाकिन का धब्बा भी मिट जाएगा। मैं उस प्रदेश का राजा हूं। अब कौन सी नारी ऐसा प्रस्ताव ठुकराएगी? चलो चलो,इस कौंधते विचार का झटका फूलन देवी को भी लगे।

इधर फूलन देवी भी देवी पूजा में लगी थीं। तभी रावण भी पहुंचता है और बगल में बैठ कर उसके उठने का इंतज़ार करता है। तभी प्रसाद देने की आवाज सुन कर आंखे खोल कर उसे पास पाता है। बड़े ही सम्मान से प्रसाद खाता है और बड़े ही सुन्दर शब्दों में धन्य धन्य कहता है। फूलन देवी बड़ी ही चकित होती है। और पूछती है - काय कछु खाए नही हो क्या? कितै दिनों के भूखे हो? रावण - कहता है कि हा बस ऐसा ही समझ लो! मेरे घर पर है नही कोई पकाने वाली तो इसलिए...तभी फूलन बोलीं - हम डाकू है ,खाने पकाने की नौकरी नही करते। रावण- तो नौकरी न करो, पर साथ चलोगी तो कुछ  न कुछ हो ही जायेगा! 

फूलन को दया आई और चल पड़ी! बताओ कहां चले? रावण अपनी माया से विमान ले आया । प्राइवेट जेट देख फूलन की आंखे खुली खुली गई। झट से विमान में और जूं...! रावन लोक में! बैंडिट क्वीन ने कहा - अरे वाह ! तुम तो काफी अमीर हो! फिर मुझे क्यों लाए? चल सही सही बता। रावण: अरे नही देवी ! ऐसी कोई बात नही! बस मन किया तो सोचा कि तुमसे बात की जाए! फूलन देवी - अच्छा?!किस बात की कमी है?! खाना पकवाने के लिए मैं ही मिली? 😂😂😂😂!!!

रावण - नही नही! बात खाने की नही है, अब ये घर पसंद आया हो तो बात बढ़ाऊं। फूलन- हैं! क्या बात है? क्या बढ़ाएगा? चल किचन दिखा? किचन में मशीन लगी थी सब रेडी था। फूलन देवी बड़ी अचम्भित हुई। सोची चलो बढ़िया है ! इसी बहाने बीहड़ में भटकना नहीं पड़ेगा! बैठे बैठे खाने को मिलेगा! रावण और फूलन खाने लगे! क्रमशः फूलन देवी बड़े ही सुख पूर्वक जीने लगी! तभी रावण सोचता है अब पट गई चलो अब बोल के देखता हूं। उधर फूलन देवी बोर होने लगी! उसे अपने दोस्त याद आने लगे। वो बोली की चलो अब इसे बाई बाई बोलती हूं! अपनी जगह चलती हूं!

फूलन देवी: अब वो जाने लगी की e- गेट का दरवाजा ही ना खुले! वो बड़ी घबरा गई! रावण: के पास पहुंची बोली की देखो अब मेरा यहां दिल नही लगता ! मुझे तो बीहड़ ही पसंद है! सो मैं चली वापिस! दरवाजा खोलो! रावण: हमारी मर्ज़ी के बिना यहाँ पर कोई पत्ता भी नहीं हिलता ! दरवाजा तो दूर की बात है ! Haha ! Haha! फूलन देवी: कौन ?कौन हो तुम? सच बोलो! रावण - अपने असली रूप में आता है! फूलन देवी भौंचकी रह जाती है! अबे साले ये क्या गजब हुई गवा! अबे चमत्कार! रावण????? रावण का भूत!  अबे बंदूक कहां गई? बंदूक निकाल कर फूलन ने बोला की जाने दो वरना यही गोली मार दूंगी!

 रावण: हम मायावी हैं चाहे तो तुम्हारी बंदूक को अभी भस्म कर दे! तुम कलियुगी नारी युद्ध की मर्यादा नही जानती ! हमने नारी जान कर तुम पर कोई शस्त्र नही उठाया! 

फूलन देवी: देखो सीधी सी बात है! हम पर जोर नहीं! दरवाजा खोलो। तभी रावण को चेतावनी याद आई। रावण एक बार फिर अपनी मौत से भयभीत और जग हंसाई से बचने के लिए बोला -जाने से कौन रोकता है! पर सुनो तुम सभी से यही कहना कि मैंने तुम्हारे साथ अप्रिय व्यवहार नही किया ! बिना तुम्हारी मर्जी के तुम्हे स्पर्श नही किया? थोड़ी मर्यादा मुझमें भी है! इतना कह कर दरवाजा खोल देता है!



फूलन देवी: सुनो अभिमानी रावण ! तुम एक गलती कब तक दोहराओगे? पहले भी अपनी लंका जलवा चुके हो! अब क्या बची कुची भी जलवायोगे! तुम्हारे पुराने कृत्य आज भी कई नर दोहराते है!  नारी को अपमानित करते है! उन्हे कमज़ोर समझते हैं! मेरा यह जीवन इसी पुरुष वादी कामुक मानसिकता का शिकार है! मुझे मर्यादा सिखाई गई मगर पुरुषों को नहीं! तुम भी अपने लोक से आकाशवाणी करवा देना कि नारी की इच्छा के विरुद्ध कोई भी कार्य नही करना चाहिए। मसलन महाभारत! अंबालिका और द्रौपदी की भूल गए लोग! नारी को कमज़ोर समझने की भूल करते हैं! और त्रेता में तुम मर गए हो फिर भी तुम्हारी कहानी को दोहराने के बाद तुम्हारा पुतला भी जलाते है! मगर अपने मन का रावण भूल जाते हैं।

यह दृष्टांत समय- यात्रा व नारी अपमान के इतिहास व वर्तमान समाज की स्थिति पर सामंजस्य बिठाने की कोशिश है।




शनिवार, 8 अक्टूबर 2022

रावण की राम पर जीत है दिवाली!

 शहर में अस्थमा का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है! क्या करें, इस प्रदूषण काल में इससे ज्यादा की उम्मीद नहीं। अस्थमा ही क्यों, नजला जुखाम और सुखी खांसी तमाम खड़े हैं बांह पसारे। और हो भी क्यों न, हम भी तो उन्हे ही इनवाइट करते हैं! मसलन कार का अत्यधिक प्रयोग, सिगरेट सेवन, खेतों को जलाना और सबसे अजीज पटाखे! जिनके बिना तो सांस लेना भी मुश्किल है। अगर पटाखे न हो तो दिवाली मने ही ना! राम जी के इंतज़ार से ज्यादा तो पटाखों की आतिश बाजी का रहता है। यह आतिशबाजी ना जाने किसके स्वागत में होती है? राम जी तो त्रेता में आए? तब तो लोगों ने दिए जलाए। पर आज कल तो न जाने क्या- क्या जलाए? जैसे किसी का बगीचा, किसी के कपड़े,किसी के हाथ पैर,किसी का चेहरा, कोई बाज़ार या किसी का घर। और मन गई दिवाली! दिवाली तो अब इन हादसों के बिना अधूरी लगती है। जब तक अखबार में पटाखों के विज्ञापन न आएं और विज्ञापन के फलस्वरूप जुड़ते आंकड़े जैसे किसी बीमारी का चलन,किसी का बहरा जो जाना,या हाई बीपी का शिकार होना या फिर जले कटे का निशान अखबार में पहले पन्ने पर प्रकाशित होना, तब तक दिवाली की मिठाईयां पचेंगी कैसे?

गुजिया की मिठास और लक्ष्मी पूजन के दिन पटाकों में लक्ष्मी की धज्जियां उड़ाना और  अट्टहास ,त्योहारी खेल का अभिन्न अंग बन गया है! बिना  पट- पट करते मसाला पाउडर के रोल और बंदूकों में गोलियों की तरह भरते नज़ारे, पुलिस अधिकारी बनने की बाल इच्छा और त्योहारों में अच्छाई बुराई की लड़ाई में शामिल होने का एक बाल मनुहार प्रयास सी लगती है। अंदर का रावण भी बाहर के रावण को जला कर सुख पाता है। विज्ञान के प्रगति का द्योतक रॉकेट अब बच्चों की पहुंच से परे नहीं! बस हनुमान की पूंछ की तरह एक छोर जलानी है , सीधा आकाश में श्या...आऊं !और 💥 बूम! बस मानो अगले वैज्ञानिक यही रॉकेट वाले ही बनेंगे। अनार की दानों की तरह बिखरे जले  मसाले,चकरी की तरह गोल गोल घूमने के बाद फर्शों पर अपनी निशानी छोड़ जाते हैं। बीड़ी में मसाले भर के देवी लक्ष्मी ब्रांड बनाम बीड़ी बम अब होठों से उतर कर छतों के किनारे और माचिस की तिल्ली का सहारा लेती है । ज़िद्दी बीड़ी होंठ से फेफड़े नही पकड़े तो बम बन गई। आतंकवादी कही की! यह बम लक्ष्मी तो आमंत्रित नहीं करती मगर कइयों की लक्ष्मी जला देती है। और भेदती है कई परतें। कपड़ों की परत, चमड़े की परत,दीवारों की परत,परदों की परत और बड़ी दूर तक की पहुंच है - ओज़ोन की परत। 

ओज़ोन की परत? जी हां! धरती को घेरती और हमें बचाती ऑक्सीजन की एक मोटी परत जिसके तले हम पल बढ़ रहे हैं और सांस ले रहे हैं। राम जी तो लक्ष्मण और सीता संग आए। और अयोध्या में खुशहाली लाए। रावण को मार गिराए! मगर हम खुद को मारने की धीमी गति के प्रयास में हैं! ना जाने किसको निमंत्रण देते हैं? अपनी मौत को या मासूम शरारत को जो हमें राम जी के आस पास  भी नहीं आने दे रही। अयोध्या वासियों ने उनका स्वागत बड़े धूम धाम से किया! नगर को दीयों से जला कर जगमगा दिया। जगमग जगमग दीए तुलसी के पौधोंकी शोभा और घर के रौनक को बढ़ाते और रामगमन को प्रकाशमान करते। मगर अब दीए चाइनीज हो गए! कौन तेल जलाए और घी! वो तो फैट बढ़ाती है। और महंगाई के ज़माने में घी ! किफायती सौदा तो पटाखे और चाइनीज लाइट्स ही लगती हैं। कुम्हार भी मुश्किल में हैं! दीए अब वो प्लास्टिक के भी रखने लगा। म्यूजिकल दिए अब मंदिरों के स्टेटस हैं। लेकिन इतने किफायती लोग हॉस्पिटल के बिल में कसर पूरी करते हैं। चलिए भगवान न करे ऐसा हो! मगर उठा  धुआं हमे तुरंत ना जलाता हो लेकिन बाद में त्वचा को सूर्य की बिना छनी पराबैंगनी किरणों का स्वागत करता है! त्वचा रोग और कैंसर की बड़ी संभावना महंगाई में आटा गीलाकर सकती है। 

तो धर्म युद्ध के साथियों आपके ज्ञान वर्धन में शामिल एक और सूची है -तुलसी के नीचे दीया जलाने से अयोध्या वासियों ने किसका स्वागत किया? स्वाभाविक सा उत्तर है राम आगमन का! और !? ओज़ोन परत का ! ये बात शायद ही किसी को मालूम हो कि अयोध्या वासियों ने  घी के दीए जला कर राम जी साथ साथ ओज़ोन परत को भी मोटा किया। कुम्हार को भी मोटा किया और बच्चों को भी । यानी स्वास्थ्य वर्धन भी और पर्यावरण का स्वागत भी !

अनजाने में ही सही, प्रदूषण का रावण जल कर हमें आनंदित करता है और ओजोन रूपी राम को भेद रहा है । ना जाने कौन सी दिवाली मना रहे है? 

हम किसका स्वागत कर रहे है - प्रदूषण

का या पर्यावरण का?

बुधवार, 14 सितंबर 2022

बंदर का बाज़ार!

 


बड़ी ही प्रसिद्ध कहानी है बिल्ली और बंदर की। कहते हैं कि एक बार दो बिल्लियां सहेली थीं। एक का नाम टिल्ली था दूसरी का नाम मिल्ली था। दोनों खेलते खेलते थक गईं। अब दोनो को जोरों की भूख लगी थी।खाना ढूंढते ढूंढते दोनों पास ही के एक रसोई घर में दबे पांव घुस गईं। ढूंढते ढूंढते टिल्ली को एक रोटी का टुकड़ा मिला और वो उसे अपने साथ बाहर ले आईं। अब दोनों में,  कौन कितना खाए इस बीच में लड़ती हुई बिल्लियां खिसियानी बिल्ली खंभा नोच हरकतें करने लगीं। मिल्ली बोली मैं ज्यादा खायूंगी या जिसने ढूंढा वो ! दोनो में पंजेबाजी होने लगी । पास ही से गुजरता बंदर सुबह से भूखा प्यासा था । रोटी देखते ही उसके मुंह में पानी आ गया। अब वो रोटी छीने कैसे? बंदर ने अक्ल लगाई। वो लगा पंचायती बनने। बन गया सरपंच। अपना स्वार्थ साधने को क्या- क्या रूप लेने होते हैं, कौन ठिकाना? कौन जाने इस सरपंची वानर खोपड़ी के पीछे कौन सी शैतान बुद्धि काम कर रही है? रोटी का लालच बंदर बुद्धि को एक आइडिया देता है। अचानक से हितैशी बन कर बंदर बिल्लियों के सामने प्रस्ताव रखता है। प्रस्तावना अविदादित रूप से भूख निवारण हेतु मान ली जाती है। बात मानने के बाद  बंदर जैसा जैसा बोलता है वैसा वैसा  बिल्ली को करना पड़ा। तुरंत ही तराजू ढूंढा जाने लगा। अब भला तराजू का क्या काम?

मालूम चला कि बंदर ने मंगाया। बड़ा ही न्याय प्रिय मालूम होता है। बिल्लियां बड़ी प्रसन्न हुईं। भागी भागी हाँफती तराजू लेकर आ गईं। बंदर महाराज ने उसके दो टुकड़े किए और तराजू के पलड़ों पर रख दिए। अब टुकड़े असमान होने के कारण टिल्ली भड़क गई। बोली की मुझे छोटा टुकड़ा नहीं खाना क्यूंकि मुझे पहले मिला। मिल्ली बोली की जब तराजू में मेरी तरफ ज्यादा आया तो मैं क्यों नहीं। अब वो झपट्टा मरती ही की बंदर को खुराफात सूझी। बोला चलो रहने दो इसमें थोड़ा कम कर देते हैं। वो टुकड़ा तोड़ के खा गया। अब मिल्लि का कम हो गया। देखते ही देखते टिल्ली मिल्ली कम ज्यादा तेरा मेरा करते करते तराजू बराबर करवाने लगीं। और बंदर रोटी चपत कर गया। 

अब प्रश्न यह है कि इस पंचतंत्र की कहानी को लिख कर कौन सा नया ज्ञान देने जा रहे है। ऐसा कौन सा फॉर्मूला इस बंदर का है , जिससे बिल्लियां भूखी ही रह गईं। फॉर्मूला तो अब भारतीय बाज़ार में अंग्रेजी भाषाओं का  बंदर नाच है । जहां भारत में एक राष्ट्र एक भाषा को लेकर अनगिनत बिल्ली लड़ाईयों का दौर है। वहीं भारत में अपना बाज़ार ढूंढता आंगल भाषा व अन्य साथी बंदर की पंचायती भूमिका में नाचते नज़र आ रहे हैं। उत्तर भारत, मध्य भारत, पूर्वी भारत, पश्चिमी भारत के लोगों में हिंदी भाषा का प्रचलन उन्हें एक सूत्र में जोड़ता है। मगर जब यही बात दक्षिण भारत की ओर जाती है तो बिल्ली की लड़ाई का रूप ले लेती है। हिंदी भाषा को मिलती असीकृति बिल्ली मतभेद और सभ्यता की लड़ाई है। तो क्यों न हम बिल्ली में से ही किसी एक को जीतने दें। वरना आँगल भाषा बंदर की निर्णायक भूमिका में  सम्पूर्ण बाज़ार का भक्षण कर जायेगी। 

दोस्तों! आज भी गुलामी की मानसिकता में जकड़ा भारत का कुछ भाग आंगल भाषा को बड़ा ही सभ्य समाज का बना कर प्रस्तुत करता है। बंदर महाराज तराजू में बांटने का काम करते हुए अपना पेट भरने का काम पूरी सफलता से कर रहा है। भूखी बिल्ली मतभेद का शिकार और तेरा मेरा में बंदर को सब दे बैठी। मेरी प्रार्थना है कि बिल्ली मानसिकता से बाहर निकले और बंदर सभ्यता की जीत ना होने दें। 

हिंदी दिवस की शुभ कामनाएं। 

जय भारत !

जय हिंद!

स्मृति सिंह 


मंगलवार, 13 सितंबर 2022

डाकिन चंबल और बीहड़ घाटी

 डाकिन चंबल और बीहड़ घाटी


 हर जगह कि अपनी कहानी होती है! मशहूरी के तमाम किस्से होते हैं।इन मशहूर किस्सों में से एक है चंबल घाटी और डाकू। जिसमें चम्बल नदी की धार चमकती तलवार सी और उसकी कलकल गहरे समुद्र सी। तलवार की तीखी धार से बीहड़ों को काटती और उसमें अपना रास्ता बनाते हुई यह नदी इस घाटी की शान मानी जाती है। शहरी प्रदूषण से कोसो दूर यह नदी बहते साफ पानी के देखने वालों के लिए सुकून की तस्वीर है। साथ ही मन में एक चकित करने वाला विचार- डाकुओं का राज और साफ नदी! इतनी साफ नदी अब तक के सफर में देखी नही। मसलन डाकुओं ने अपने पाप चंबल में न बहाया। इतने भक्तों में गंगा यमुना मैली ?! डाकू तो यूं ही बदनाम हैं। सियासी जंग में जहां लाशें कॉविड में गंगा में बहा दी गईं वहीं श्रापित चंबल इससे बच गईं। जी हां ! चंबल के बहते साफ पानी का राज़ एतिहासिक ग्रन्थ महाभारत में वर्णित है। इसके अनुसार द्रौपदी ने चीर-हरण के बाद चम्बल को श्राप दिया था कि इसका पानी कोई भी नहीं पिएगा। शायद यही कारण है कि चम्बल नदी को हेय दृष्टि से देखा जाने लगा वहीं लोगों ने चंबल से दूरी बना ली और यह श्राप एक प्राकृतिक वरदान बन गया।

 नतीजतन प्रकृति आज भी भरी है इन बीहड़ों में, विकास की आधुनिक गंगा यहां नही बही। प्रकृति के शौशव से साफ़ था कि ये डाकु देन हैं उस व्यवस्था की जो कानून की आड़ में अन्याय करते हैं। बीहड़ में तलवार उठती है। और तब बीहड़ देता है एक डाकू! अस्तित्व और जीवन की लड़ाई एक ऐसे इतिहास कि कहानी कहता है जहां डाकुओं का दबदबा रहा है। इक्कीसवीं सदी में अजूबा लगने वाली ये बातें बीहड़ों में कितनी सच हैं यहाँ आकर पता चला। एक आम आदमी के लिए डाकू का चित्रण फ़िल्मों के जरिए ही है। शोले और अन्य कई फिल्में- डाकुओं के विविध रूपों को बयां करती हैं लेकिन असली कहानी बीहड़ों में खामोश है। मसलन पान सिंह तोमर -अपने ही न्याय के लिए जब कोई हथियार उठा ले तब हम उसे हम डाकू कहते हैं!बीहड़ से कुछ ऐसा महसूस हुआ।

मध्य कालीन भारत में मुगलों और अंग्रेजी राज की उपज यहां का रंजिशी और भेदभावी समाज, जिसके कुछ अक्स देखने को मिले!लेकिन अब तो पुलिस है। सब ऑनलाइन है और अपनी फोटो आ जाने का डर यहां के तत्कालीन प्रशासन तंत्र की सख़्ती के प्रभाव को साबित कर रहा था। इस बात का डर अब भी व्यवस्था के डाकुओं को है!यह भी महसूस हुआ! मुझे बेहद ही सुरक्षा के साथ बस में बिठा के भेजा गया। तब मुझे याद आया -फूलन देवी बरक्स राजपूती राज! बैंडिट क्वीन की यह जंग जातिगत नारी सम्मान व अपमान की एक अद्भुद कहानी है। चंबल घाटी की प्रकृति मानव को अपनी सुरक्षा का सटीक संदेश देती है। बीहड़ सबके लिए हैं। चाहे डाकू चाहे पुलिस। डाकुओं का बीहड़ में खो जाना बताता है कि बीहड़ की मिट्टी और चमड़ा एक रंग हैं। ऐसे कई मट मैले रंगों को समेटे बहती है यहां की असली रानी - चम्बल नदी ! जिसे गौ चर्म से अभिमंत्रित व स्पर्श प्राप्ति के उपरांत जल से बना होने के कारण चर्मण्वती भी कहा जाता था।

चंबल डाकिन के अपने डाकू है - घड़ियाल कछुए और परिंदे!जैसे प्रकृति वैसी मनोवृति। चंबल डाकिन ने दिल लूट लिया! दिन दहाड़े! यह नदी धौलपुर में भी बहती है,जहां एक ओर मध्य प्रदेश और दूसरी ओर राजस्थान है! मध्य प्रदेश की सरकार ने यहां राफ्टिंग की व्यवस्था की हुई है!नदी दो राज्यों में अविवादित बंटी है! यहां के घड़ियाल बेहद ही आलसी और सुकून में दिखे। ऐसा प्रतीत हुया की प्राकृतिक स्वीमिंग पूल के वह बेखौफ सदस्य हैं। जहां मर्जी तैरे और जहां मर्जी लेटे। अपनी खतरनाक नाक पर चिड़ियों को खिलाएं और नचायें। गंभीर से दिखने वाले ये घड़ियाल पानी के शहंशाह से लगे।सर्दी में धूप लेने पहुंचे मगरमच्छ भी कोई कम खतरनाक नहीं। अपने शिकार की टोह में ये दबे पांव तैरे चले आते है किनारे की ओर। इनका खौफ आस पास की इलाकों में सुनाई देता है। लोगों के इनका डर थर्रा देने वाला है। डाकुओं की भांति यह भी घाटी में खौफ और मौत की कहानी कहते हैं। इन्ही जलीय डाकुओं के बीच हैं यहां के शरीफ कछुए जो स्वयं को बचाना जानते हैं अपनी शक्ती शाली अभेद पीठ के कारण। नदी से ऊबने के कारण जब ये किनारे पर आते हैं तो लगता है कि चारों तरफ का ब्यौरा लेने आए हैं। अपनी पतली लचकती गर्दन को निकल कर नदी तीरे का नजारा लेकर यह वापिस नदी में फिसल जाते हैं। वहीं नीचे रंग बिरंगी छोटी मछलियों का पानी के ऊपरी सतह पर तैरता दृश्य विहंगम हैं जब यह सब प्राकृतिक स्पंदन से स्वयं को हमसे जोड़ती हैं! एक मूक वार्तालाप करती हैं हम सभी से।

इन सभी के बीच वहां के जनता के आस्था की कहानी कहता है वहां का शिव मन्दिर। भगवान शिव के मंदिर के बगल से बहती चंबल अभी भी अपने बच्चों को बचाए हुए है! ऐसी जैव विविधता बिना किसी सरकारी हल्लाहोल के आश्चर्य जनक है!भगवान शिव के भक्तों की यह भूमि बेहद ही शांत और पर्यटकों के लिए बाहें पसारे नजर आई!दिसंबर का माह और परदेसी पंछियों का स्वागत करती चंबल बेहद शांत स्वभाव की नदी लगी! पर्यटक पक्षियों को भी शरण देने वाली नदी गूंजती है कई चिड़ियों की चहचहाहट से। डेढ़ सौ से अधिक प्रजातियों की समागम स्थल यह चम्बल घाटी चकवा चकवी, किंगफीशर, बार-हेडेड गीज़(बार सिर वाला हंस), ब्राह्मणी डक, कॉमन टील(छोटी मुर्गबी), पेलिकन( हवासील बतख), फ्लेमिंगो (राजहंस)और कॉर्मोरेंट( मछली खाने वाले)।इसके अलावा आम दिनों में नजर आने वाले पंचीरा पक्षियों की अटखेलियां और शिकार करने की अलबेली अदा अत्यंत मनमोहक दृश्यों में से एक है। इनकी सबसे अधिक आबादी चम्बल घाटी के बीहड़ों में पाई जाती है। चंबल अरावली कि सहायक नदी के संग पहाड़ी से बहती हुई इटावा में यमुना में जा मिलती है।हालांकि इसका उद्गम स्थल मध्यप्रदेश में जानापाव की पहाड़ी है।बीहड़ों के बीच प्रकृति मानव का यह सह -अस्तित्व इतिहास को बदलने में कितनी कारगर साबित होगी यह तो बीहड़ों की गूंज बताएगी।
























शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2022

जादुई कलम और भविष्य!

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 फि की डायरी और विवादों का शहर!

इस मॉडर्न हाई टेक युग में जब आपका जाना हो एक ऐसे शहर जहां बात जुबान और उससे चलने वाली कलम की हो! कलम ऐसी की बस कैसे भी घुमा दी जाए। चाहे सीधी चाहे गोल! इस  गोल गोल शहर में सीधे पन्नों की सीढ़ी लाइन वाली डायरी पर ऊंचे नीचे अक्षर। वो अक्षर भी अनकहे प्रशासन की। आपके स्वागत शुल्क की। स्वागत शुल्क सदा आपकी सेवा के लिए। कलम के गुलाम अक्षर, उस डायरी में बड़े मूल्यवान हैं। उनको इतराहट है इस बात कि कब वो गोल घूमें और उनका मुल्य बढ़ जाए। और सामने वाली की आंखों का गोला और फैल जाए। इस डायरी का आशीर्वाद है की लिखने वाले ने इसमें कई डंडे जोड़े और हटाए । ये डंडे जिस पर पड़े वो खिदमदगार और  गुनहगार है। डंडे ऐसे की चोट काला असर सीधे जेब पर। पहले चूहे कुतर जाते थे जेब, अब कलम की नीब ही काफी है छेद करने को। छेद भी ऐसा की चिल्लर के निकलने का कोई स्थान ही नही। निकलते है तो सिर्फ बड़े बड़े नोट। 

चुनावी वादों की तरह बड़े वादों की यह कलम आश्वासन है की आप नामांकित हुए। अब आपका भविष्य सुरक्षित हुया। सुरक्षा कि यह गारंटी सीमेंट के विज्ञापन से ज्यादा असरदार साबित हुई। सुनहरे ख़्वाब दिखाती यह कलम शक लाक बूम बूम की सुनहरी परी वाली दुनिया में ले जाती है। जो बोलो वो मिलेगा और बस बोलते जाओ। स्वप्न दर्शी के जाने के बाद कलम सवाल उठाती है? सुनो जी मैं ऐसे ख्वाब नही सजाती। मुझे थोड़ा और घुमाओ और इंक गिरायो। एक दो छड़ी चलाओ गोल अक्षरों के आगे वरना मैं रूठी। कलम के रूठने के डर से प्रशासन अपनी छड़ी चला देता है। कहीं रूठ गई तो कई ख्वाब टूट जायेंगे। इस मशहूर कलम ने इस शहर के  विवाद के तमाम किस्से लिखे है। डायरी उसकी हमराज है। वो अपना दुख और सुख उस डायरी में घूम कर व्यक्त करती है। अपने मालिक के हाथो की मालकिन कलम डायरी की पक्की सहेली है। अपनी फीलिंग की इंक उसके पन्नों को भीगाती है। कोरे कागज को मूल्यवान बनाने में इसी का हाथ है। डायरी से लिपटी यह कलम खोलती हैं वही पन्ने जहां हिसाब रुका था। कभी कभी यह कलम मिस्टर इंडिया वाला रोल भी करती है। लिखती तो है मगर कुछ दिखता नही। कभी कभी तो हमराज डायरी के पन्ने भी उसकी दवात को भाप बना के उड़ा देते हैं। 

ये इस कलम की जादूगरी है कि वो कैसे भी घूम जाती है? घूम के बड़े बड़ों को पस्त कर जाती है। जरा सी भी हिसाब में गड़बड़, बस चल जाती है कलम उसे बराबर करने को। बराबर भी ऐसे की बिना किसी समीकरण के। मतलब ऐंवई ! मगर सामने वाले दिमागी समीकरण बिलकुल असंतुलित हो जाता है। बस वो कहा से इसे बराबर करे? उसके पास कोई डायरी भी नही ,प्रशासन भी नही, कलम तो हाथ ही नहीं आती। 

इस अजब शहर में जब मेरा आना हुआ तो मेरा मिलना हुए कलम के मालिक से। जिसकी जादुई जुबान से कलम की कीमत कई गुणा बढ़ जाती है। कलम के मालिक बड़ा ही शरीफ व्यक्ति प्रतीत हुए। बस जीवन की जोड़ तोड़ ने उन्हें आज यह मुकाम दिया है। कलम के मालिक की एक लंबी टीम है जो बिना किसी सवाल के कलम को समर्पित है। अपने अपने स्वाहा में कलम कितने बलिदान मांगेगी इसकी कोई गिनती नहीं। बस चलती है कलम गोल गोल और शहर का मिज़ाज बयां करती हैं। किसी का मिजाज लाल किसी का हरा करती है। कभी कभी तो फटे पन्ने करे हुए हिसाब का भी हिसाब नही बताती। सामने वाले की आँखें गोल हो जाती है। वो ढूंढता है कोई ऐसी कलम जिसकी इंक आगे के पन्नों में छप गईं हों। कोई तो सुराख मिले! 

 प्यारे दोस्तों ! इस डिजिटल युग में फि का कलमकिरण हमें बता रहा है की सत्ताधारी के एक ही लक्षण होते हैं चाहे वो बटन दबाता हो या कलम की नीब। बस बदलता है डायरी का स्वरूप ! कागज़ी डायरी  डिजिटल हुई ।दुनिया गोल है इसीलिए कलम भी गोल है। मालिक के बनाए गोल लड्डू का प्रसाद पूरी टीम मिल बांट के खाते हैं। खाते खाते जाओ और प्रभु के गुण गाते जाओ!

(यह आज के शिक्षा व्यवस्था पर एक व्यंग्य है! इसका वास्तविकता से पूरा लेना देना है, मसलन निजी शिक्षण संस्थान)

खोया खोया चांद!

Moon and scientist

 कृपया ध्यान दें: यह एक व्यंग्य है, इसे अन्यथा ना लें!

खोया खोया चांद !

बात शुरू होती है एक चुटकुले से 

समाचार: NASA द्वारा चांद पर फिशन व फ्यूजन की तैयारी!

आम लोगों के बीच चर्चा : चंद्रमा को खत्म करने की तैयारी चल रही है हो!

तो ऊ सब भी क्या करेगा ! 

सोचा होगा धरती खत्म हो जाएगी इससे अच्छा चंद्रमा ही खत्म कर दिया जाए! रात तो वैसे भी काली है और एडिसन जिंदाबाद!

लेखक काफी चिंता में आ जाता है और अपनी तमाम आशंकाएं ज़ाहिर करता है! 


 क्या चांद को जापान वाला रोग लगेगा?क्या होगा जब चांद खतम हो जाएगा? ऋतुएं वार महीने सब खतम! और त्योहारों का क्या! अच्छा है हर साल बदला नहीं करेंगी! एक हीं डेट होगी! छुट्टियां प्लान हो जाएगी! ऑफ़िस में छुट्टियों को लेकर पॉलिटिक्स बंद! ईद का चांद जुमला प्रसांगिक नहीं लगेगा! और शरद पूर्णिमा का क्या? आयुर्वेदिक इलाज का असर बेअसर जाएगा! ज्योतिषियों का क्या होगा!? कुंडली का एक घर ख़ाली! अरे रे! सूर्य पर धरती टिकेगी! या होगा चांद में बीचों बीच छेद और वो चमकती चूड़ी की तरह नजर आयेगा! नहीं नहीं दो टुकड़े होंगे! एक परियों के सिर पर हैयरबंड की तरह लगेगा या या चांद पर तारे लगेंगे! समुंदर क लहरें बंद ! लो कर लो बात! सारे गाने बंद how unromantic! लोगों के मूड स्विंग बंद! चांद छुपा बादल में इत्यादि गानों में चांद आउट ऑफ़ स्क्रिप्ट लगेगा! शायरों की डायरी खाली हो जाएगी! पूर्णिमा के व्रत बंद! धरती की रिश्तेदारी बंद! अब मामा किसे कहेंगे! चांदनी नाम की लड़कियों को alien ya परग्रही समझा जाएगा! लगता है बृहस्पति से आयी है! और किसकी खूबसूरती पर चार चांद लगेगा? धरती पर चांद कहां! फिलहाल तो चांद दिल थामे बस अपनी धड़कने गिन रहा होगा! या चंद्रमा अमावस की टोह लेगा! कहां छुपूं? मैं नहीं रहूंगा तो कोई तो इंतजाम करूं!चलो बृहस्पति का चांद उधार लिया जाए! फिर वो ज्यूपिटर के चांद को इंपोर्ट करने की कोशिश करेगा ! तमाम कोशिशों में इन्सान अपनी बुद्धि में विवेक का इंपोर्ट कब करेगा? ये भी नहीं कि किसी से उधार ही लेले! मायूस चांद ने सोचा बृहस्पती को नुक्सान ! चलो कुछ तो अक्ल बाकी है! कुछ सोच विचार के बाद चांद सभी देवताओं के साथ पहुंचेगा भगवान शिव के पास। क्या शिव का तीसरा नेत्र खुलेगा या वो वैज्ञानिकों को धरती पर ही कोई idea देंगे ! है भगवान! बचाओ कलियुगी भस्मासुर से! क्या विष्णु कोई मोहिनी रूप धारण करेंगे! पर ये लीला सबको मालूम है! कोई नहीं फँसेगा! कोई नया idea सोचिए! या नृत्य के लिए लालची कूते की स्क्रिप्ट दोहराई जाएगी! अपने जैसा देख कर कूद पड़ेगा कूप में! तब ही शायद जान बचे! वरना तो भगवान ही मालिक है! मुए ये वैज्ञानिक चैन नहीं लेने दे रहे ! लाइट चली गई! बल्ब जलाओ! वैसे चंद्रायन का क्या? घूमेगा इधर उधर ! नहीं तो बाइक बन जाएगी! बाइक चद्रायान मिशन की तरफ से! अगली बारी किसकी? मंगल की! मंगलायन भी तैयार है! अरे क्यों? शास्त्रों में लिखा है धरती पर जीवन वहीं से आया है! अरे जुपिटर भी! चलो जहां से पानी मिल जाए! और बढ़ती जनसंख्या का बोझ भी ले लेगा! मगर हम नहीं सुधरेंगे!          

 इति शुभम्…


गुरुवार, 3 फ़रवरी 2022

एक भारतीय का वायरस


 भारतीय का वायरस राजचित्र!

देश के मानस नक्शे पर दो ही बड़ी परिचर्चा है! वायरस और राजनीति। वैसे प्राकृतिक छींक ने  एक ही आ….. छी...में कई गंदगी निकाली। मगर राजनीतिक मलबे से कई वायरस और उसके अनोखे वेरिएंट निकल कर बाहर आ रहे हैं। इस विभिन्नता ने वायरस राजनीती में हाइब्रिड नेताओं का हल्लाबोल हूया है। आव देखा न ताव बस कूद पड़े हैं।इस इनैक्टिव और अजीवित वायरस ने हमारे समाज के कई जांबाज जिंदा भ्रष्ट- शिष्टाचारियों को उजागर किया है। स्वास्थ्य प्रणाली की कलई खुली हैं! मसलन ऑक्सीजन, वेंटिलेटर, डॉक्टर, फार्मासिस्ट, दवाइयां इत्यादि। समाज के दशमुखी रावण मुखौटे उतरे  या बन गए, यह समझ से परे था। इलेक्शन से हुई राजनीतिक अनबन,राजनीतिक हमले और खूनी खेल। मौका भुनाने के सुअवसरों में एक विचित्र सी गहमागहमी देखने को मिली। 

राजनीतिक पर्दे उठ गए, इसी बीच इलेक्शन की डफली और नेताओं का राग। इस कोरोना वायरस में सबके अपने ही सुर हैं। बस आम आदमी बेसुरा है। उसकी ही बोलती बंद है। वैसे भी लॉकडाउन में सब बंद हैं, मगर खुली है फ़िल्में, सीरियल्स, दवाइयां, अस्पताल और तूफ़ान।वैसे भी इस देश में विभिन्न प्रकार की दिक्कतें है,ऊपर से ये वायरस। विभिन्नताओं वाले देश में वह भी कई रूप बना गया। इसके विभिन्न रूपों की सौंदर्य रस पर उत्साहित राजनीति का कुत्सित लावण्य खुल कर खिल गया। अब वैक्सीन पर भी काम बवाल नही । प्रधानमंत्री योजनाओं के तर्ज पर प्रधानमंत्री स्ट्रेन वाले वैक्सीन की घोषणा हुई। किसी बड़े कुशाग्र बुद्धि वाले नेता ने ख़ुद सबसे पहले लगवा के जनता में इसका डंका पीट  कर आतंकित करने की लादेन मंशा का हिंट दिया। ऐसे चिंतनशील नेताओं में लोगों के प्रति ममत्व व प्रेम उमड़ रहा है। अब तो हर ओर जनता "बच्चे" समान हो गई है। वोट बैंक के नागरिकों के लिए अब यह एक नई प्रकार की  राजनीतिक मानवता है। 

ऐसी मानवीयता दुर्लभ है! ऐसे संवेदनशील नेता ऑक्सीजन के पीछे रोते पाए गए, जो बिजली पानी मुफ़्त बांट रहे हैं। उधर मीडिया भी कोरोना और उसके नए बहरूपियों की ज्ञान गंगा बहाने में पीछे नहीं। उधर गंगा में लाश बह रही है। इधर रेतों के टीलों में छिपी लाश गंगा को बचा रही हैं। फूल, मूर्तियाँ  तक तो ठीक था और अब  लाश भी! अब आत्माओं के बाद गंगा को ही मुक्त करेंगे। नमामि गंगे! हर हर गंगे! भर दो गंगे!

इल्जाम का वायरस अभी भी मंडरा रहा है। कभी राजनीति पर,कभी ऑक्सीजन पर, कभी वैक्सीन पर,कभी डॉक्टर पर, कभी फार्मेसी पर, कभी लॉकडाउन पर!सब फेंक रहे एक दूसरे पर इल्ज़ाम! इस राजनीती में चीन छोड़कर सब बदनाम!समझ ही नही आ रहा की किसे कोसा जाए? हाय हाय वायरस, हाय हाय कॉरोना। अभी अभी एक नई आवाज सुनाई दी। ओ…माइक्रोन! ऐसे लगा कि फिर से प्रकृति की  छींक आ गई ।अब इडियट बॉक्स पर  नवीन राग अल्पाए जाएंगे या एक यह एक मूक बधीर चलचित्र साबित होगी! आइए जानते हैं अन्तराल के बाद।

स्मृति सिंह

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कोविड- 19 के दौरान आगरा के निजी चिकित्सालयों में जैव-चिकित्सा अपशिष्टों के उचित वर्गीकरण की अवमानना।

 कोविड- 19 के दौरान आगरा के निजी चिकित्सालयों में जैव-चिकित्सा अपशिष्टों के उचित वर्गीकरण की अवमानना।

स्टोरी: स्मृति सिंह

छायाकार : सुनील कुमार, प्रशांत शर्मा

आगरा

कोविड -१९ और अस्पताल

कोरोना महामारी की पड़ती मार में भी आगरा शहर के अस्पतालों कि लापरवाही कम नहीं हुई है। महामारी के भयंकर परिणामों को रोज़ देखने के बावजूद इन अस्पतालों की गहरी निद्रा टूट नहीं रही। बढ़े हुए काम में यह अपनी स्वास्थ्य व पर्यावरण संबंधी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ रहें हैं। जिसका घातक परिणाम आस-पास के लोगों व जीव जंतुओं पर पड़ सकता है!

चिकित्सा अपशिष्ट, पर्यावरण की दृष्टि से बेहद ही महत्त्वपूर्ण माने जाते है। किसी भी अस्पताल और उसके लोगों की सेहत इसी पर निर्भर करती है। सबसे पहले समझते है कि चिकित्सा अपशिष्ट होते क्या है? भारत के बायोमेडिकल वेस्ट (प्रबंधन और हैंडलिंग) नियम, 1998 के अनुसार “कोई भी अपशिष्ट जो मनुष्यों या जानवरों के निदान, उपचार या टीकाकरण के दौरान या अनुसंधान गतिविधियों से संबंधित या जैविक उत्पादन या परीक्षण में उत्पन्न होता

Hospital waste
Colour of dustbin


Black dustbin


है।” इसी को क्रियान्वित करने के लिए भारत सरकार ने चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन व हैंडलिंग नियम वर्ष 1998 में पारित किया। जो कि उन सभी लोगों पर लागू होता है जो इससे सम्बंधित डील करते हैं। जैसे अस्पताल, नर्सिंग होम, क्लीनिक, डिस्पेंसरी, पशु संस्थान, पैथोलोजिकल लैब और ब्लड बैंक। इन सब से उत्पन्न बायोमेडिकल कचरे को प्राप्त करने में, जमा करने में, आवागमन कराने में, निराकरण करने में विशेष सावधानियां बरतनी पड़ती हैं. ऐसे संस्थानों में मेडिकल कचरे के उपचार हेतु उपयुक्त मशीनें और आधुनिक उपकरण लगाने का इंतज़ाम लाज़मी है। उनके पास इसके निराकरण के लिए उचित व्यवस्था का प्रमाण पत्र होना चाहिए। यदि, किसी के पास यह प्रमाण पत्र नहीं पाया जाता है तो चिकित्सालय का पंजीकरण रद्द किया जाएगा। तो आइए देखते है आगरा के विभिन्न क्षेत्रों के गैर जिम्मेदाराना रवैये की तस्वीर । जिनमें उनका अल्प ज्ञान और समाज के प्रति उदासीन रवैया खुल कर साबित हो रहा है। पहली तस्वीर है आगरा के सिकंदरा व भगवान टॉकीज स्थित निजी अस्पतालों कि जिसमें कूड़े का वर्गीकरण स्पष्ट नहीं है।

 चित्र 1– नीचे संलग्न है

जिसमें आप देख सकते हैं की काले प्लास्टिक में सामान्य कूड़ा भी मिला दिया गया है। प्लेट से लेकर सीरिंज तक इसमें डाल दिए गए हैं। सबसे महत्त्वपूर्ण बात कि कोविड जैसी बीमारी के बावजूद कोई रेड प्लास्टिक नहीं। वहीं पीले रंग के कचड़े को लेकर थोड़ी सी सावधानी नजर आती है। मगर वहीं नीले कचड़े में थरमो कॉल नज़र आ रहे हैं। कूड़े के वर्गीकरण को लेकर उचित ज्ञान का अभाव साफ नजर आता है।

वहीं बोदला स्थित एक निजी हॉस्पिटल में कूड़ेदान बेहद ही गंदी स्तिथि में पाए गए।

चित्र 2:

इन चित्रों में प्लास्टिक की जगह कूड़े को अलग- अलग रंगों के कूड़ेदानो में डाला गया है। पीले कूड़ेदान में कांच डालना साफ बताता है कि कर्मचारियों को उचित ट्रेनिंग नहीं दी गई है। जबकि नीला कूड़ा खाली पड़ा है। लाल कूड़े में सावधानी बरती गई है।

उधर बोदला के एक और अन्य अस्पताल में भय उत्पन्न करने वाली स्थिति पाई गई। जहां आक्सीजन सिलिंडर के साथ ज़मीन पर खुला कचड़ा अनाथ की भांति पड़ा है। जबकि मानकों के अनुसार कूड़ा उचित रंग के प्लास्टिक बैग में बंद होना चाहिए।

चित्र 3-

इसमें साफ है कि हॉस्पिटल प्रबंधन अपने कर्तव्यों को निभाने में असमर्थ है। और वैश्विक महामारी में इनका योगदान अद्भुत है। जैसा कि आप देख सकते हैं कि खुला कूड़ा बिना किसी की देख रेख के यूं ही बाहर पड़ा है। और सामान्य कूड़े के साथ इनका संगम अस्पताल के कर्मचारियों कि अयोग्यता को स्पष्ट करता है।

लाल प्लास्टिक में डाला सामान्य कूड़ा इसे संक्रमण का द्योतक बनाते हैं। नीला व पीला प्लास्टिक कहीं दृश्यमान नहीं हैं। सभी तरह के कूडों का सम्मिश्रण एक ही में कर दिया गया है।

कूड़े के वैज्ञानिक वर्गीकरण के लिए बी. एम. डब्ल्यू. अधिनियम के विवरण इस प्रकार हैं-

 पीला – ऐसे थैलों में सर्जरी के दौरान कटे हुए शरीर के हिस्से, लैब के नमूने, रक्त युक्त चिकित्सा सामग्री ( रुई या पट्टी), शोध में उपयुक्त जानवरों के अंग डाले जाते हैं। इन्हें जलाया जाता है या बहुत गहराई में दबा देते हैं।

लाल- इसमें दस्ताने, कैथेटर, आई.वी.सेट , कल्चर प्लेट को जमा किया जाता है। इन सभी को काट कर डिस्नफेक्ट किया जाता है। उसके बाद इन्हें जला देते है।

नीला या सफ़ेद बैग- इसमें गत्ते के डिब्बे, प्लास्टिक के बैग जिनमें सुई , कांच के टुकड़े या चाकू रखा गया हो उन्हें डाला जाता है। इनको भी काट कर केमिकल द्वारा उपचारित किया जाता है। उसके उपरान्त या तो जलाते हैं या गहराई में दफन कर देते हैं।

काला- इनमें नुकसानदायक, पूरानी बेकार दवाइयां, कीटनाशक पदार्थ और जली हुई राख डाली जाती है. इसको किसी गहरे खुदे गड्ढे में डालकर ऊपर से मिट्टी दाल देते हैं।

नोट- जलाने के लिए इंसीनरेटर का प्रयोग किया जाता है।

 इस वर्गीकरण से निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि, आगरा जैसे द्वितीय श्रेणी के शहरों में विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ-साथ भारत सरकार द्वारा निर्धारित मानकों कि धज्जियां उड़ रही हैं। डॉक्टर समेत सम्पूर्ण मेडिकल स्टाफ और अपूर्ण रूप से अल्प-प्रशिक्षित कर्मचारियों की एक पूरी टीम है,जो कोरोना महामारी को लेकर गंभीर नहीं हैं। जिसकी पुष्टि 2020 में गठित ओवरसाइट कमिटी की रिपोर्ट ने की है। महज 36 प्रतिशत प्रशिक्षित चिकित्सक और 19 प्रतिशत प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ इस महामारी से निबटने के लिए समर्थ पाए गए।

बचे अप्रशिक्षित अवसरवादी, लाचार व्यवस्था को और लचर बनाने में प्रगति-शील हैं। प्रशासन की ओर से इन अस्पतालों को मिला लाइसेंस आपस की मिलीभगत और धांधली का पुख़्ता सबूत है।

इसी संदर्भ में कोविड-19 के शुरुआती चरणों में, ग्रीन ट्रिब्यूनल के ऑर्डिनेंस नंबर-72/20 में उत्तरप्रदेश के जीव-चिकित्सा अपशिष्टों के वैज्ञानिक व्यवस्था कि जांच की मांग की गई। जिसके तहत ओवर साइट कमिटी ने पाया कि, आगरा के सरकारी अस्पताल क्वारंटाइन कक्षों के लिए असमर्थ थे। हालांकि, इन अस्पतालों में बढ़े अतिरिक्त उत्सर्जित अपशिष्ट दवाब हेतु उपचार व प्रबंधन के उचित उपाय थे।लेकिन, स्तिथि की गंभीरता तब और बढ़ गई जब निजी अस्पतालों ने भी कोविड वॉर्ड की घोषणा कर दी। क्योंकि, उत्तरस्वरूप ओवर साइट रिपोर्ट में प्रकाशित तथ्यों के अनुसार, जब आगरा प्रशासन से कोविड के बाद निकले कुल अपशिष्ट के बढ़े वजन यानी मात्रा की मांग की गई तब गोल-मोल आंकड़े प्रस्तुत किए गए। इस कमिटी में उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अतिरिक्त केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी भी सम्मिलित थे। जिसके तहत, बताया गया कि आगरा प्रशासन द्वारा सरकारी टेंडर में भाग लेने के बावजूद बार-कोड प्रणाली को लागू नहीं किया गया है। जिस कारण सिर्फ बोरियों की गिनती का उपाय बचता है। जबकि ट्रॉली संख्या से भी कुल वजन आंका जा सकता है। ट्रॉली संख्या को ग्लोबल पोजिशनिंग व्यवस्था से जोड़ कर ट्रैक किया जाता है। मगर यह प्रणाली अभी क्रियान्वित या सक्रिय नहीं हुई है। ओवर-साइट कमिटी 2020 कि रिपोर्ट भी साफ कहती है कि लाल-कूड़े दान का प्रयोग ना के बराबर है, जो इस अंखोदेखे हाल पर मुहर लगाती है। पीले कूड़े दानों में प्लास्टिक कचड़ा, गॉगल्स, फेस मास्क, नाइट्राइल ग्लव्स, हजमत सूट का पाया जाना बेहद चिन्ता जनक और खतरनाक स्तिथि का ब्योरा देती है।

इन सब के बीच प्रशासन-तन्त्र की जवाबदेही

किसे बनती है, यह अस्पष्ट है। और जब सरकारी तंत्र में जिम्मेदार लोग ही आंखे बंद कर लेते हैं तो और निजी अस्पतालों के क्या कहने? ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि आगरा के मात्र दो अस्पतालों के पास सरकारी नियमों के अनुसार वार्षिक जीव चिकित्सा अपशिष्ट रिपोर्ट है। बाकि के उत्सर्जन पर किसी की कोई रोक नहीं। बेधड़क, बेरोकटोक पी.पी.ई किट, डायग्नोस्टिक किट, फेस मास्क, ग्लव्स, सीरिंज इत्यादि निजी मन-मौजियों के हाथ लग, यहां वहां पड़ी है। बोरियों में बंद कर सरकारी गाड़ियों में भर दी जाती है। कोविड के बढ़ते चलन में यदि इन अपशिष्टों का योगदान हो भी रहा है तो, आज भी आगरा कि आम जनता इससे बेखबर है। हालांकि, समय-समय पर कचड़ा प्रबन्धन से जुड़े सुझाव के रूप में सेंटर फोर साइंस एंड एन्वाइरन्मेंट में उसका हल भी बताया गया। ज़ीरो वेस्ट सिटी का रोड मैप बनाया गया मगर, सब असर हीन। जबकि मसला अब शहरी घरेलू कूड़े के दायरों से बाहर निकल कोविड महामारी में बनते नए हथियार के जन्म को लेकर संदर्भित है। यह एक ऐसा हथियार है जिसे आगरा प्रशासन स्वयं अज्ञानता वश उत्सर्जित कर इसके प्रसंस्करण से पीछा छुड़ाने कि कतार में है। यह अनदेखी जाने कितनों को अंधा करेगी, इसके आंकड़े हमें ज़रूर मिलेंगे।


काली यमुना को फेयर एंड लवली कौन लगाए?!

यमुना प्रदूषण



कालिया मर्दन

आगरा स्तिथ रूणकता का शनि मंदिर, भक्त श्रद्धालुओं से सराबोर यह भक्ति स्थान शनि देव की अनुकंपा के लिए प्रसिद्ध है। शहर से दूर यमुना नदी के तीरे प्राचीन शनि मंदिर श्रद्धालुओं के तांता लगने के कारण भीड़ भाड़ का केंद्र है। आस पास के सभी मंदिरों में यही स्थान सबसे अधिक लोकप्रिय दर्शन स्थल है। मंदिर परिसर में अक्सर भंडारों का आयोजन होता रहता है। जिस कारण वहां मौजूद लोगों में उत्साह की भावना बनी रहती है। आम तौर पर वहां शनिवार का दिन उत्सव समान होता है और एक छोटे स्तर का मेला आयोजित होता है। मेले में बच्चों के खिलौने,मिठाइयां,मंदिर श्रद्धालुओं के लिए पूजन सामग्री,तेल इत्यादि का पूरा प्रबंध होता है। मंदिर में शनि देव की मूर्ति के अलावा हनुमान, श्री राम, शिव  पार्वती , गणेश इत्यादि की मूर्तियां भी मौजूद थीं। 

मंदिर परिसर श्रद्धा भावना में सर्वोपरी था मगर जो बात इस ईश प्रेमी को लग गई वो थी, वहां का गन्दगी।

चारों तरफ़ हृदय से ईश्वर को मानने वाले लोगों के इर्द-गिर्द अस्वच्छता का वातावरण था। जगह जगह दोने, गंदे पत्तल भिनभिनाती मक्खियां  और कीचड़ में सना मंदिर परिसर ईश्वर का निवास स्थान कम और शैतान स्थल ज्यादा लग रहा था। वहीं बगल से बहती यमुना नदी भी इससे अछूती न रही। आजकल भारतीय सरकार द्वारा नमामी गंगे और हर हर गंगे के नारों से गुंजायमान प्रकल्प लोकलुभावन प्रतीत होता हैं। वहीं गंगा की सखी  यमुना कूड़ा -लुभावन स्थल बनी हुई है। मंदिर के बाद कूड़े दान का कोई स्थान है तो वह है बहती यमुना। वैसे भी बहते पानी में क्या बचा है? सब बह जाता है! जनता के पाप और अब ठोस कूड़ा भी। यमुना नदी सूर्य देव की पुत्री, यम और शनि की बहन बताई गई है। ऐसा लग रहा है की यमुना पर भी शनि चढ़ गया है।  कहते हैं कि मानव के पापों को हरने वाली नदियां ही होती है। शायद मानव के काले कृत्यों को मां की भांति स्वयं में समेट कर काली हुईं हैं। 

उन्हें देख द्वापर युग का कालिया मर्दन लीला स्मरण हो आया। जब गेंद के यमुना में जाने से श्री कृष्ण  यमूना की ओर बढ़ने लगे,तब उन्हे डराया गया की यह नदी विषैली है, इसके जहर से  कोई नही बचा । इसमें एक अति विषैला कालिया सर्प वास करता है जिसके फन से निकलने वाला विष मृत्युकारक है। मगर इस सब से बिना डरे श्री कृष्ण यमुना की कालिमा को पीने और विष का हरण करने यमुना में उतर गए। सर्प के शीश पर नृत्य कर  सर्प को विष हीन कर उसे समुद्र का रास्ता दिखाते हैं।  उसे मथुरा से दूर कर यमुना को स्वच्छ निर्मल बनाते हैं। काली मृत यमुना पुनः जीवित हो जाती हैं और लोगों के उपयोगी हो जाती है।

 इस लीला को प्रतिकात्माक रूप से लें तो  कालिकाल की तरह ही द्वापर में भी यमुना प्रदूषण नामक कालिया सांप मंशा से ग्रसित ढोंगी भक्तों के भेंट चढ़ गई थी। रूप में काली यमुना आज भी बह रही है। मगर झाग, कूड़ा और मलबे के साथ। पूजा सामग्री के साथ साथ शहरी कूड़े का निस्तारण इसी में किया जाता है। पूछे जाने पर ग्रामीण लोग शहरी क्षेत्रों में बसे लोगों पर आरोप लगाते हैं और शहरी क्षेत्र के ग्रामीणों की अंध भक्ति पर। मगर अपने मन के कालिया को अभी भी छिपाए बैठे हैं। बस अब इंतज़ार है कृष्ण का जो कलिकाल में कोई नया रूप धारण करके आए। या फिर क्यों न ऐसा हो कि आम जनता में उनकी भक्ति स्वरूप वास्तविकता में श्री कृष्ण का हृदय में अवतार हो। वह जन जन में अवतरित हो  अज्ञानता वश प्रदूषण वाली कालिया मानसिकता को दूर करें और उसे मथुरा से क्या, दूरस्थ तक ऐसा भेजें कि लौट के ही न आए। हमारे कालिया मंशा के शीश पर  ऐसा  मर्दन हो की यमुना फिर से निर्मल स्वच्छ जल का स्रोत बन पाए।

यमुना नदी त्रिवेणी संगम की देवी समान ही प्रतीत हो नाकी हमारे मन व घर से निकाले गए कूड़े का सुगम  विसर्जन स्थल।ऐसा हो तो वाकई में हरे कृष्ण! हरे कृष्ण! हरे राम! हरे हरे! कहने में गर्व महसूस हो। हम सही मायनों में ईश भक्त कहलाएं।हम नही कहते की कोई  महापुरुष आए और सब ठीक कर दे । मगर क्यों न वो कोई हम ही हो!क्यों न हम कृष्ण की ही भांति प्रकृति की भी ऐसी भक्ति करें कि स्वछता का आशीर्वाद  मिले ।इससे स्वस्थ मन व शरीर का विकास जिसमें किसी भी प्रकार का प्रदूषण न हो। किसी भी प्रकार का मानव कुकृत कालापन न हो।  यमुना  सच्ची श्रद्धा की सूत्रधार हो और उसमें स्वच्छ भारत की निर्मल धार हो। स्वच्छ भारत! स्वस्थ भारत!की संकल्पना इसके बिना अकल्पनीय प्रतीत होता है।

स्मृति सिंह

डाकिन चंबल और बीहड़ घाटी

रावण ने जब फूलन देवी का अपहरण किया...

 बात उन दिनों की है जब रावण तक बात पहूंची की चम्बल में एक नारी है। वह बड़ी ही बलवती है, और ना जाने कितने पुरूषों का संघार कर चुकी है। शायद क...