फि की डायरी और विवादों का शहर!
इस मॉडर्न हाई टेक युग में जब आपका जाना हो एक ऐसे शहर जहां बात जुबान और उससे चलने वाली कलम की हो! कलम ऐसी की बस कैसे भी घुमा दी जाए। चाहे सीधी चाहे गोल! इस गोल गोल शहर में सीधे पन्नों की सीढ़ी लाइन वाली डायरी पर ऊंचे नीचे अक्षर। वो अक्षर भी अनकहे प्रशासन की। आपके स्वागत शुल्क की। स्वागत शुल्क सदा आपकी सेवा के लिए। कलम के गुलाम अक्षर, उस डायरी में बड़े मूल्यवान हैं। उनको इतराहट है इस बात कि कब वो गोल घूमें और उनका मुल्य बढ़ जाए। और सामने वाली की आंखों का गोला और फैल जाए। इस डायरी का आशीर्वाद है की लिखने वाले ने इसमें कई डंडे जोड़े और हटाए । ये डंडे जिस पर पड़े वो खिदमदगार और गुनहगार है। डंडे ऐसे की चोट काला असर सीधे जेब पर। पहले चूहे कुतर जाते थे जेब, अब कलम की नीब ही काफी है छेद करने को। छेद भी ऐसा की चिल्लर के निकलने का कोई स्थान ही नही। निकलते है तो सिर्फ बड़े बड़े नोट।
चुनावी वादों की तरह बड़े वादों की यह कलम आश्वासन है की आप नामांकित हुए। अब आपका भविष्य सुरक्षित हुया। सुरक्षा कि यह गारंटी सीमेंट के विज्ञापन से ज्यादा असरदार साबित हुई। सुनहरे ख़्वाब दिखाती यह कलम शक लाक बूम बूम की सुनहरी परी वाली दुनिया में ले जाती है। जो बोलो वो मिलेगा और बस बोलते जाओ। स्वप्न दर्शी के जाने के बाद कलम सवाल उठाती है? सुनो जी मैं ऐसे ख्वाब नही सजाती। मुझे थोड़ा और घुमाओ और इंक गिरायो। एक दो छड़ी चलाओ गोल अक्षरों के आगे वरना मैं रूठी। कलम के रूठने के डर से प्रशासन अपनी छड़ी चला देता है। कहीं रूठ गई तो कई ख्वाब टूट जायेंगे। इस मशहूर कलम ने इस शहर के विवाद के तमाम किस्से लिखे है। डायरी उसकी हमराज है। वो अपना दुख और सुख उस डायरी में घूम कर व्यक्त करती है। अपने मालिक के हाथो की मालकिन कलम डायरी की पक्की सहेली है। अपनी फीलिंग की इंक उसके पन्नों को भीगाती है। कोरे कागज को मूल्यवान बनाने में इसी का हाथ है। डायरी से लिपटी यह कलम खोलती हैं वही पन्ने जहां हिसाब रुका था। कभी कभी यह कलम मिस्टर इंडिया वाला रोल भी करती है। लिखती तो है मगर कुछ दिखता नही। कभी कभी तो हमराज डायरी के पन्ने भी उसकी दवात को भाप बना के उड़ा देते हैं।
ये इस कलम की जादूगरी है कि वो कैसे भी घूम जाती है? घूम के बड़े बड़ों को पस्त कर जाती है। जरा सी भी हिसाब में गड़बड़, बस चल जाती है कलम उसे बराबर करने को। बराबर भी ऐसे की बिना किसी समीकरण के। मतलब ऐंवई ! मगर सामने वाले दिमागी समीकरण बिलकुल असंतुलित हो जाता है। बस वो कहा से इसे बराबर करे? उसके पास कोई डायरी भी नही ,प्रशासन भी नही, कलम तो हाथ ही नहीं आती।
इस अजब शहर में जब मेरा आना हुआ तो मेरा मिलना हुए कलम के मालिक से। जिसकी जादुई जुबान से कलम की कीमत कई गुणा बढ़ जाती है। कलम के मालिक बड़ा ही शरीफ व्यक्ति प्रतीत हुए। बस जीवन की जोड़ तोड़ ने उन्हें आज यह मुकाम दिया है। कलम के मालिक की एक लंबी टीम है जो बिना किसी सवाल के कलम को समर्पित है। अपने अपने स्वाहा में कलम कितने बलिदान मांगेगी इसकी कोई गिनती नहीं। बस चलती है कलम गोल गोल और शहर का मिज़ाज बयां करती हैं। किसी का मिजाज लाल किसी का हरा करती है। कभी कभी तो फटे पन्ने करे हुए हिसाब का भी हिसाब नही बताती। सामने वाले की आँखें गोल हो जाती है। वो ढूंढता है कोई ऐसी कलम जिसकी इंक आगे के पन्नों में छप गईं हों। कोई तो सुराख मिले!
प्यारे दोस्तों ! इस डिजिटल युग में फि का कलमकिरण हमें बता रहा है की सत्ताधारी के एक ही लक्षण होते हैं चाहे वो बटन दबाता हो या कलम की नीब। बस बदलता है डायरी का स्वरूप ! कागज़ी डायरी डिजिटल हुई ।दुनिया गोल है इसीलिए कलम भी गोल है। मालिक के बनाए गोल लड्डू का प्रसाद पूरी टीम मिल बांट के खाते हैं। खाते खाते जाओ और प्रभु के गुण गाते जाओ!
(यह आज के शिक्षा व्यवस्था पर एक व्यंग्य है! इसका वास्तविकता से पूरा लेना देना है, मसलन निजी शिक्षण संस्थान)