कालिया मर्दन
आगरा स्तिथ रूणकता का शनि मंदिर, भक्त श्रद्धालुओं से सराबोर यह भक्ति स्थान शनि देव की अनुकंपा के लिए प्रसिद्ध है। शहर से दूर यमुना नदी के तीरे प्राचीन शनि मंदिर श्रद्धालुओं के तांता लगने के कारण भीड़ भाड़ का केंद्र है। आस पास के सभी मंदिरों में यही स्थान सबसे अधिक लोकप्रिय दर्शन स्थल है। मंदिर परिसर में अक्सर भंडारों का आयोजन होता रहता है। जिस कारण वहां मौजूद लोगों में उत्साह की भावना बनी रहती है। आम तौर पर वहां शनिवार का दिन उत्सव समान होता है और एक छोटे स्तर का मेला आयोजित होता है। मेले में बच्चों के खिलौने,मिठाइयां,मंदिर श्रद्धालुओं के लिए पूजन सामग्री,तेल इत्यादि का पूरा प्रबंध होता है। मंदिर में शनि देव की मूर्ति के अलावा हनुमान, श्री राम, शिव पार्वती , गणेश इत्यादि की मूर्तियां भी मौजूद थीं।
मंदिर परिसर श्रद्धा भावना में सर्वोपरी था मगर जो बात इस ईश प्रेमी को लग गई वो थी, वहां का गन्दगी।
चारों तरफ़ हृदय से ईश्वर को मानने वाले लोगों के इर्द-गिर्द अस्वच्छता का वातावरण था। जगह जगह दोने, गंदे पत्तल भिनभिनाती मक्खियां और कीचड़ में सना मंदिर परिसर ईश्वर का निवास स्थान कम और शैतान स्थल ज्यादा लग रहा था। वहीं बगल से बहती यमुना नदी भी इससे अछूती न रही। आजकल भारतीय सरकार द्वारा नमामी गंगे और हर हर गंगे के नारों से गुंजायमान प्रकल्प लोकलुभावन प्रतीत होता हैं। वहीं गंगा की सखी यमुना कूड़ा -लुभावन स्थल बनी हुई है। मंदिर के बाद कूड़े दान का कोई स्थान है तो वह है बहती यमुना। वैसे भी बहते पानी में क्या बचा है? सब बह जाता है! जनता के पाप और अब ठोस कूड़ा भी। यमुना नदी सूर्य देव की पुत्री, यम और शनि की बहन बताई गई है। ऐसा लग रहा है की यमुना पर भी शनि चढ़ गया है। कहते हैं कि मानव के पापों को हरने वाली नदियां ही होती है। शायद मानव के काले कृत्यों को मां की भांति स्वयं में समेट कर काली हुईं हैं।
उन्हें देख द्वापर युग का कालिया मर्दन लीला स्मरण हो आया। जब गेंद के यमुना में जाने से श्री कृष्ण यमूना की ओर बढ़ने लगे,तब उन्हे डराया गया की यह नदी विषैली है, इसके जहर से कोई नही बचा । इसमें एक अति विषैला कालिया सर्प वास करता है जिसके फन से निकलने वाला विष मृत्युकारक है। मगर इस सब से बिना डरे श्री कृष्ण यमुना की कालिमा को पीने और विष का हरण करने यमुना में उतर गए। सर्प के शीश पर नृत्य कर सर्प को विष हीन कर उसे समुद्र का रास्ता दिखाते हैं। उसे मथुरा से दूर कर यमुना को स्वच्छ निर्मल बनाते हैं। काली मृत यमुना पुनः जीवित हो जाती हैं और लोगों के उपयोगी हो जाती है।
इस लीला को प्रतिकात्माक रूप से लें तो कालिकाल की तरह ही द्वापर में भी यमुना प्रदूषण नामक कालिया सांप मंशा से ग्रसित ढोंगी भक्तों के भेंट चढ़ गई थी। रूप में काली यमुना आज भी बह रही है। मगर झाग, कूड़ा और मलबे के साथ। पूजा सामग्री के साथ साथ शहरी कूड़े का निस्तारण इसी में किया जाता है। पूछे जाने पर ग्रामीण लोग शहरी क्षेत्रों में बसे लोगों पर आरोप लगाते हैं और शहरी क्षेत्र के ग्रामीणों की अंध भक्ति पर। मगर अपने मन के कालिया को अभी भी छिपाए बैठे हैं। बस अब इंतज़ार है कृष्ण का जो कलिकाल में कोई नया रूप धारण करके आए। या फिर क्यों न ऐसा हो कि आम जनता में उनकी भक्ति स्वरूप वास्तविकता में श्री कृष्ण का हृदय में अवतार हो। वह जन जन में अवतरित हो अज्ञानता वश प्रदूषण वाली कालिया मानसिकता को दूर करें और उसे मथुरा से क्या, दूरस्थ तक ऐसा भेजें कि लौट के ही न आए। हमारे कालिया मंशा के शीश पर ऐसा मर्दन हो की यमुना फिर से निर्मल स्वच्छ जल का स्रोत बन पाए।
यमुना नदी त्रिवेणी संगम की देवी समान ही प्रतीत हो नाकी हमारे मन व घर से निकाले गए कूड़े का सुगम विसर्जन स्थल।ऐसा हो तो वाकई में हरे कृष्ण! हरे कृष्ण! हरे राम! हरे हरे! कहने में गर्व महसूस हो। हम सही मायनों में ईश भक्त कहलाएं।हम नही कहते की कोई महापुरुष आए और सब ठीक कर दे । मगर क्यों न वो कोई हम ही हो!क्यों न हम कृष्ण की ही भांति प्रकृति की भी ऐसी भक्ति करें कि स्वछता का आशीर्वाद मिले ।इससे स्वस्थ मन व शरीर का विकास जिसमें किसी भी प्रकार का प्रदूषण न हो। किसी भी प्रकार का मानव कुकृत कालापन न हो। यमुना सच्ची श्रद्धा की सूत्रधार हो और उसमें स्वच्छ भारत की निर्मल धार हो। स्वच्छ भारत! स्वस्थ भारत!की संकल्पना इसके बिना अकल्पनीय प्रतीत होता है।
स्मृति सिंह