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गुरुवार, 3 फ़रवरी 2022

कोविड- 19 के दौरान आगरा के निजी चिकित्सालयों में जैव-चिकित्सा अपशिष्टों के उचित वर्गीकरण की अवमानना।

 कोविड- 19 के दौरान आगरा के निजी चिकित्सालयों में जैव-चिकित्सा अपशिष्टों के उचित वर्गीकरण की अवमानना।

स्टोरी: स्मृति सिंह

छायाकार : सुनील कुमार, प्रशांत शर्मा

आगरा

कोविड -१९ और अस्पताल

कोरोना महामारी की पड़ती मार में भी आगरा शहर के अस्पतालों कि लापरवाही कम नहीं हुई है। महामारी के भयंकर परिणामों को रोज़ देखने के बावजूद इन अस्पतालों की गहरी निद्रा टूट नहीं रही। बढ़े हुए काम में यह अपनी स्वास्थ्य व पर्यावरण संबंधी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ रहें हैं। जिसका घातक परिणाम आस-पास के लोगों व जीव जंतुओं पर पड़ सकता है!

चिकित्सा अपशिष्ट, पर्यावरण की दृष्टि से बेहद ही महत्त्वपूर्ण माने जाते है। किसी भी अस्पताल और उसके लोगों की सेहत इसी पर निर्भर करती है। सबसे पहले समझते है कि चिकित्सा अपशिष्ट होते क्या है? भारत के बायोमेडिकल वेस्ट (प्रबंधन और हैंडलिंग) नियम, 1998 के अनुसार “कोई भी अपशिष्ट जो मनुष्यों या जानवरों के निदान, उपचार या टीकाकरण के दौरान या अनुसंधान गतिविधियों से संबंधित या जैविक उत्पादन या परीक्षण में उत्पन्न होता

Hospital waste
Colour of dustbin


Black dustbin


है।” इसी को क्रियान्वित करने के लिए भारत सरकार ने चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन व हैंडलिंग नियम वर्ष 1998 में पारित किया। जो कि उन सभी लोगों पर लागू होता है जो इससे सम्बंधित डील करते हैं। जैसे अस्पताल, नर्सिंग होम, क्लीनिक, डिस्पेंसरी, पशु संस्थान, पैथोलोजिकल लैब और ब्लड बैंक। इन सब से उत्पन्न बायोमेडिकल कचरे को प्राप्त करने में, जमा करने में, आवागमन कराने में, निराकरण करने में विशेष सावधानियां बरतनी पड़ती हैं. ऐसे संस्थानों में मेडिकल कचरे के उपचार हेतु उपयुक्त मशीनें और आधुनिक उपकरण लगाने का इंतज़ाम लाज़मी है। उनके पास इसके निराकरण के लिए उचित व्यवस्था का प्रमाण पत्र होना चाहिए। यदि, किसी के पास यह प्रमाण पत्र नहीं पाया जाता है तो चिकित्सालय का पंजीकरण रद्द किया जाएगा। तो आइए देखते है आगरा के विभिन्न क्षेत्रों के गैर जिम्मेदाराना रवैये की तस्वीर । जिनमें उनका अल्प ज्ञान और समाज के प्रति उदासीन रवैया खुल कर साबित हो रहा है। पहली तस्वीर है आगरा के सिकंदरा व भगवान टॉकीज स्थित निजी अस्पतालों कि जिसमें कूड़े का वर्गीकरण स्पष्ट नहीं है।

 चित्र 1– नीचे संलग्न है

जिसमें आप देख सकते हैं की काले प्लास्टिक में सामान्य कूड़ा भी मिला दिया गया है। प्लेट से लेकर सीरिंज तक इसमें डाल दिए गए हैं। सबसे महत्त्वपूर्ण बात कि कोविड जैसी बीमारी के बावजूद कोई रेड प्लास्टिक नहीं। वहीं पीले रंग के कचड़े को लेकर थोड़ी सी सावधानी नजर आती है। मगर वहीं नीले कचड़े में थरमो कॉल नज़र आ रहे हैं। कूड़े के वर्गीकरण को लेकर उचित ज्ञान का अभाव साफ नजर आता है।

वहीं बोदला स्थित एक निजी हॉस्पिटल में कूड़ेदान बेहद ही गंदी स्तिथि में पाए गए।

चित्र 2:

इन चित्रों में प्लास्टिक की जगह कूड़े को अलग- अलग रंगों के कूड़ेदानो में डाला गया है। पीले कूड़ेदान में कांच डालना साफ बताता है कि कर्मचारियों को उचित ट्रेनिंग नहीं दी गई है। जबकि नीला कूड़ा खाली पड़ा है। लाल कूड़े में सावधानी बरती गई है।

उधर बोदला के एक और अन्य अस्पताल में भय उत्पन्न करने वाली स्थिति पाई गई। जहां आक्सीजन सिलिंडर के साथ ज़मीन पर खुला कचड़ा अनाथ की भांति पड़ा है। जबकि मानकों के अनुसार कूड़ा उचित रंग के प्लास्टिक बैग में बंद होना चाहिए।

चित्र 3-

इसमें साफ है कि हॉस्पिटल प्रबंधन अपने कर्तव्यों को निभाने में असमर्थ है। और वैश्विक महामारी में इनका योगदान अद्भुत है। जैसा कि आप देख सकते हैं कि खुला कूड़ा बिना किसी की देख रेख के यूं ही बाहर पड़ा है। और सामान्य कूड़े के साथ इनका संगम अस्पताल के कर्मचारियों कि अयोग्यता को स्पष्ट करता है।

लाल प्लास्टिक में डाला सामान्य कूड़ा इसे संक्रमण का द्योतक बनाते हैं। नीला व पीला प्लास्टिक कहीं दृश्यमान नहीं हैं। सभी तरह के कूडों का सम्मिश्रण एक ही में कर दिया गया है।

कूड़े के वैज्ञानिक वर्गीकरण के लिए बी. एम. डब्ल्यू. अधिनियम के विवरण इस प्रकार हैं-

 पीला – ऐसे थैलों में सर्जरी के दौरान कटे हुए शरीर के हिस्से, लैब के नमूने, रक्त युक्त चिकित्सा सामग्री ( रुई या पट्टी), शोध में उपयुक्त जानवरों के अंग डाले जाते हैं। इन्हें जलाया जाता है या बहुत गहराई में दबा देते हैं।

लाल- इसमें दस्ताने, कैथेटर, आई.वी.सेट , कल्चर प्लेट को जमा किया जाता है। इन सभी को काट कर डिस्नफेक्ट किया जाता है। उसके बाद इन्हें जला देते है।

नीला या सफ़ेद बैग- इसमें गत्ते के डिब्बे, प्लास्टिक के बैग जिनमें सुई , कांच के टुकड़े या चाकू रखा गया हो उन्हें डाला जाता है। इनको भी काट कर केमिकल द्वारा उपचारित किया जाता है। उसके उपरान्त या तो जलाते हैं या गहराई में दफन कर देते हैं।

काला- इनमें नुकसानदायक, पूरानी बेकार दवाइयां, कीटनाशक पदार्थ और जली हुई राख डाली जाती है. इसको किसी गहरे खुदे गड्ढे में डालकर ऊपर से मिट्टी दाल देते हैं।

नोट- जलाने के लिए इंसीनरेटर का प्रयोग किया जाता है।

 इस वर्गीकरण से निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि, आगरा जैसे द्वितीय श्रेणी के शहरों में विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ-साथ भारत सरकार द्वारा निर्धारित मानकों कि धज्जियां उड़ रही हैं। डॉक्टर समेत सम्पूर्ण मेडिकल स्टाफ और अपूर्ण रूप से अल्प-प्रशिक्षित कर्मचारियों की एक पूरी टीम है,जो कोरोना महामारी को लेकर गंभीर नहीं हैं। जिसकी पुष्टि 2020 में गठित ओवरसाइट कमिटी की रिपोर्ट ने की है। महज 36 प्रतिशत प्रशिक्षित चिकित्सक और 19 प्रतिशत प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ इस महामारी से निबटने के लिए समर्थ पाए गए।

बचे अप्रशिक्षित अवसरवादी, लाचार व्यवस्था को और लचर बनाने में प्रगति-शील हैं। प्रशासन की ओर से इन अस्पतालों को मिला लाइसेंस आपस की मिलीभगत और धांधली का पुख़्ता सबूत है।

इसी संदर्भ में कोविड-19 के शुरुआती चरणों में, ग्रीन ट्रिब्यूनल के ऑर्डिनेंस नंबर-72/20 में उत्तरप्रदेश के जीव-चिकित्सा अपशिष्टों के वैज्ञानिक व्यवस्था कि जांच की मांग की गई। जिसके तहत ओवर साइट कमिटी ने पाया कि, आगरा के सरकारी अस्पताल क्वारंटाइन कक्षों के लिए असमर्थ थे। हालांकि, इन अस्पतालों में बढ़े अतिरिक्त उत्सर्जित अपशिष्ट दवाब हेतु उपचार व प्रबंधन के उचित उपाय थे।लेकिन, स्तिथि की गंभीरता तब और बढ़ गई जब निजी अस्पतालों ने भी कोविड वॉर्ड की घोषणा कर दी। क्योंकि, उत्तरस्वरूप ओवर साइट रिपोर्ट में प्रकाशित तथ्यों के अनुसार, जब आगरा प्रशासन से कोविड के बाद निकले कुल अपशिष्ट के बढ़े वजन यानी मात्रा की मांग की गई तब गोल-मोल आंकड़े प्रस्तुत किए गए। इस कमिटी में उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अतिरिक्त केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी भी सम्मिलित थे। जिसके तहत, बताया गया कि आगरा प्रशासन द्वारा सरकारी टेंडर में भाग लेने के बावजूद बार-कोड प्रणाली को लागू नहीं किया गया है। जिस कारण सिर्फ बोरियों की गिनती का उपाय बचता है। जबकि ट्रॉली संख्या से भी कुल वजन आंका जा सकता है। ट्रॉली संख्या को ग्लोबल पोजिशनिंग व्यवस्था से जोड़ कर ट्रैक किया जाता है। मगर यह प्रणाली अभी क्रियान्वित या सक्रिय नहीं हुई है। ओवर-साइट कमिटी 2020 कि रिपोर्ट भी साफ कहती है कि लाल-कूड़े दान का प्रयोग ना के बराबर है, जो इस अंखोदेखे हाल पर मुहर लगाती है। पीले कूड़े दानों में प्लास्टिक कचड़ा, गॉगल्स, फेस मास्क, नाइट्राइल ग्लव्स, हजमत सूट का पाया जाना बेहद चिन्ता जनक और खतरनाक स्तिथि का ब्योरा देती है।

इन सब के बीच प्रशासन-तन्त्र की जवाबदेही

किसे बनती है, यह अस्पष्ट है। और जब सरकारी तंत्र में जिम्मेदार लोग ही आंखे बंद कर लेते हैं तो और निजी अस्पतालों के क्या कहने? ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि आगरा के मात्र दो अस्पतालों के पास सरकारी नियमों के अनुसार वार्षिक जीव चिकित्सा अपशिष्ट रिपोर्ट है। बाकि के उत्सर्जन पर किसी की कोई रोक नहीं। बेधड़क, बेरोकटोक पी.पी.ई किट, डायग्नोस्टिक किट, फेस मास्क, ग्लव्स, सीरिंज इत्यादि निजी मन-मौजियों के हाथ लग, यहां वहां पड़ी है। बोरियों में बंद कर सरकारी गाड़ियों में भर दी जाती है। कोविड के बढ़ते चलन में यदि इन अपशिष्टों का योगदान हो भी रहा है तो, आज भी आगरा कि आम जनता इससे बेखबर है। हालांकि, समय-समय पर कचड़ा प्रबन्धन से जुड़े सुझाव के रूप में सेंटर फोर साइंस एंड एन्वाइरन्मेंट में उसका हल भी बताया गया। ज़ीरो वेस्ट सिटी का रोड मैप बनाया गया मगर, सब असर हीन। जबकि मसला अब शहरी घरेलू कूड़े के दायरों से बाहर निकल कोविड महामारी में बनते नए हथियार के जन्म को लेकर संदर्भित है। यह एक ऐसा हथियार है जिसे आगरा प्रशासन स्वयं अज्ञानता वश उत्सर्जित कर इसके प्रसंस्करण से पीछा छुड़ाने कि कतार में है। यह अनदेखी जाने कितनों को अंधा करेगी, इसके आंकड़े हमें ज़रूर मिलेंगे।


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