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बुधवार, 14 सितंबर 2022

बंदर का बाज़ार!

 


बड़ी ही प्रसिद्ध कहानी है बिल्ली और बंदर की। कहते हैं कि एक बार दो बिल्लियां सहेली थीं। एक का नाम टिल्ली था दूसरी का नाम मिल्ली था। दोनों खेलते खेलते थक गईं। अब दोनो को जोरों की भूख लगी थी।खाना ढूंढते ढूंढते दोनों पास ही के एक रसोई घर में दबे पांव घुस गईं। ढूंढते ढूंढते टिल्ली को एक रोटी का टुकड़ा मिला और वो उसे अपने साथ बाहर ले आईं। अब दोनों में,  कौन कितना खाए इस बीच में लड़ती हुई बिल्लियां खिसियानी बिल्ली खंभा नोच हरकतें करने लगीं। मिल्ली बोली मैं ज्यादा खायूंगी या जिसने ढूंढा वो ! दोनो में पंजेबाजी होने लगी । पास ही से गुजरता बंदर सुबह से भूखा प्यासा था । रोटी देखते ही उसके मुंह में पानी आ गया। अब वो रोटी छीने कैसे? बंदर ने अक्ल लगाई। वो लगा पंचायती बनने। बन गया सरपंच। अपना स्वार्थ साधने को क्या- क्या रूप लेने होते हैं, कौन ठिकाना? कौन जाने इस सरपंची वानर खोपड़ी के पीछे कौन सी शैतान बुद्धि काम कर रही है? रोटी का लालच बंदर बुद्धि को एक आइडिया देता है। अचानक से हितैशी बन कर बंदर बिल्लियों के सामने प्रस्ताव रखता है। प्रस्तावना अविदादित रूप से भूख निवारण हेतु मान ली जाती है। बात मानने के बाद  बंदर जैसा जैसा बोलता है वैसा वैसा  बिल्ली को करना पड़ा। तुरंत ही तराजू ढूंढा जाने लगा। अब भला तराजू का क्या काम?

मालूम चला कि बंदर ने मंगाया। बड़ा ही न्याय प्रिय मालूम होता है। बिल्लियां बड़ी प्रसन्न हुईं। भागी भागी हाँफती तराजू लेकर आ गईं। बंदर महाराज ने उसके दो टुकड़े किए और तराजू के पलड़ों पर रख दिए। अब टुकड़े असमान होने के कारण टिल्ली भड़क गई। बोली की मुझे छोटा टुकड़ा नहीं खाना क्यूंकि मुझे पहले मिला। मिल्ली बोली की जब तराजू में मेरी तरफ ज्यादा आया तो मैं क्यों नहीं। अब वो झपट्टा मरती ही की बंदर को खुराफात सूझी। बोला चलो रहने दो इसमें थोड़ा कम कर देते हैं। वो टुकड़ा तोड़ के खा गया। अब मिल्लि का कम हो गया। देखते ही देखते टिल्ली मिल्ली कम ज्यादा तेरा मेरा करते करते तराजू बराबर करवाने लगीं। और बंदर रोटी चपत कर गया। 

अब प्रश्न यह है कि इस पंचतंत्र की कहानी को लिख कर कौन सा नया ज्ञान देने जा रहे है। ऐसा कौन सा फॉर्मूला इस बंदर का है , जिससे बिल्लियां भूखी ही रह गईं। फॉर्मूला तो अब भारतीय बाज़ार में अंग्रेजी भाषाओं का  बंदर नाच है । जहां भारत में एक राष्ट्र एक भाषा को लेकर अनगिनत बिल्ली लड़ाईयों का दौर है। वहीं भारत में अपना बाज़ार ढूंढता आंगल भाषा व अन्य साथी बंदर की पंचायती भूमिका में नाचते नज़र आ रहे हैं। उत्तर भारत, मध्य भारत, पूर्वी भारत, पश्चिमी भारत के लोगों में हिंदी भाषा का प्रचलन उन्हें एक सूत्र में जोड़ता है। मगर जब यही बात दक्षिण भारत की ओर जाती है तो बिल्ली की लड़ाई का रूप ले लेती है। हिंदी भाषा को मिलती असीकृति बिल्ली मतभेद और सभ्यता की लड़ाई है। तो क्यों न हम बिल्ली में से ही किसी एक को जीतने दें। वरना आँगल भाषा बंदर की निर्णायक भूमिका में  सम्पूर्ण बाज़ार का भक्षण कर जायेगी। 

दोस्तों! आज भी गुलामी की मानसिकता में जकड़ा भारत का कुछ भाग आंगल भाषा को बड़ा ही सभ्य समाज का बना कर प्रस्तुत करता है। बंदर महाराज तराजू में बांटने का काम करते हुए अपना पेट भरने का काम पूरी सफलता से कर रहा है। भूखी बिल्ली मतभेद का शिकार और तेरा मेरा में बंदर को सब दे बैठी। मेरी प्रार्थना है कि बिल्ली मानसिकता से बाहर निकले और बंदर सभ्यता की जीत ना होने दें। 

हिंदी दिवस की शुभ कामनाएं। 

जय भारत !

जय हिंद!

स्मृति सिंह 


गुरुवार, 3 फ़रवरी 2022

एक भारतीय का वायरस


 भारतीय का वायरस राजचित्र!

देश के मानस नक्शे पर दो ही बड़ी परिचर्चा है! वायरस और राजनीति। वैसे प्राकृतिक छींक ने  एक ही आ….. छी...में कई गंदगी निकाली। मगर राजनीतिक मलबे से कई वायरस और उसके अनोखे वेरिएंट निकल कर बाहर आ रहे हैं। इस विभिन्नता ने वायरस राजनीती में हाइब्रिड नेताओं का हल्लाबोल हूया है। आव देखा न ताव बस कूद पड़े हैं।इस इनैक्टिव और अजीवित वायरस ने हमारे समाज के कई जांबाज जिंदा भ्रष्ट- शिष्टाचारियों को उजागर किया है। स्वास्थ्य प्रणाली की कलई खुली हैं! मसलन ऑक्सीजन, वेंटिलेटर, डॉक्टर, फार्मासिस्ट, दवाइयां इत्यादि। समाज के दशमुखी रावण मुखौटे उतरे  या बन गए, यह समझ से परे था। इलेक्शन से हुई राजनीतिक अनबन,राजनीतिक हमले और खूनी खेल। मौका भुनाने के सुअवसरों में एक विचित्र सी गहमागहमी देखने को मिली। 

राजनीतिक पर्दे उठ गए, इसी बीच इलेक्शन की डफली और नेताओं का राग। इस कोरोना वायरस में सबके अपने ही सुर हैं। बस आम आदमी बेसुरा है। उसकी ही बोलती बंद है। वैसे भी लॉकडाउन में सब बंद हैं, मगर खुली है फ़िल्में, सीरियल्स, दवाइयां, अस्पताल और तूफ़ान।वैसे भी इस देश में विभिन्न प्रकार की दिक्कतें है,ऊपर से ये वायरस। विभिन्नताओं वाले देश में वह भी कई रूप बना गया। इसके विभिन्न रूपों की सौंदर्य रस पर उत्साहित राजनीति का कुत्सित लावण्य खुल कर खिल गया। अब वैक्सीन पर भी काम बवाल नही । प्रधानमंत्री योजनाओं के तर्ज पर प्रधानमंत्री स्ट्रेन वाले वैक्सीन की घोषणा हुई। किसी बड़े कुशाग्र बुद्धि वाले नेता ने ख़ुद सबसे पहले लगवा के जनता में इसका डंका पीट  कर आतंकित करने की लादेन मंशा का हिंट दिया। ऐसे चिंतनशील नेताओं में लोगों के प्रति ममत्व व प्रेम उमड़ रहा है। अब तो हर ओर जनता "बच्चे" समान हो गई है। वोट बैंक के नागरिकों के लिए अब यह एक नई प्रकार की  राजनीतिक मानवता है। 

ऐसी मानवीयता दुर्लभ है! ऐसे संवेदनशील नेता ऑक्सीजन के पीछे रोते पाए गए, जो बिजली पानी मुफ़्त बांट रहे हैं। उधर मीडिया भी कोरोना और उसके नए बहरूपियों की ज्ञान गंगा बहाने में पीछे नहीं। उधर गंगा में लाश बह रही है। इधर रेतों के टीलों में छिपी लाश गंगा को बचा रही हैं। फूल, मूर्तियाँ  तक तो ठीक था और अब  लाश भी! अब आत्माओं के बाद गंगा को ही मुक्त करेंगे। नमामि गंगे! हर हर गंगे! भर दो गंगे!

इल्जाम का वायरस अभी भी मंडरा रहा है। कभी राजनीति पर,कभी ऑक्सीजन पर, कभी वैक्सीन पर,कभी डॉक्टर पर, कभी फार्मेसी पर, कभी लॉकडाउन पर!सब फेंक रहे एक दूसरे पर इल्ज़ाम! इस राजनीती में चीन छोड़कर सब बदनाम!समझ ही नही आ रहा की किसे कोसा जाए? हाय हाय वायरस, हाय हाय कॉरोना। अभी अभी एक नई आवाज सुनाई दी। ओ…माइक्रोन! ऐसे लगा कि फिर से प्रकृति की  छींक आ गई ।अब इडियट बॉक्स पर  नवीन राग अल्पाए जाएंगे या एक यह एक मूक बधीर चलचित्र साबित होगी! आइए जानते हैं अन्तराल के बाद।

स्मृति सिंह

डाकिन चंबल और बीहड़ घाटी

रावण ने जब फूलन देवी का अपहरण किया...

 बात उन दिनों की है जब रावण तक बात पहूंची की चम्बल में एक नारी है। वह बड़ी ही बलवती है, और ना जाने कितने पुरूषों का संघार कर चुकी है। शायद क...