शहर में अस्थमा का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है! क्या करें, इस प्रदूषण काल में इससे ज्यादा की उम्मीद नहीं। अस्थमा ही क्यों, नजला जुखाम और सुखी खांसी तमाम खड़े हैं बांह पसारे। और हो भी क्यों न, हम भी तो उन्हे ही इनवाइट करते हैं! मसलन कार का अत्यधिक प्रयोग, सिगरेट सेवन, खेतों को जलाना और सबसे अजीज पटाखे! जिनके बिना तो सांस लेना भी मुश्किल है। अगर पटाखे न हो तो दिवाली मने ही ना! राम जी के इंतज़ार से ज्यादा तो पटाखों की आतिश बाजी का रहता है। यह आतिशबाजी ना जाने किसके स्वागत में होती है? राम जी तो त्रेता में आए? तब तो लोगों ने दिए जलाए। पर आज कल तो न जाने क्या- क्या जलाए? जैसे किसी का बगीचा, किसी के कपड़े,किसी के हाथ पैर,किसी का चेहरा, कोई बाज़ार या किसी का घर। और मन गई दिवाली! दिवाली तो अब इन हादसों के बिना अधूरी लगती है। जब तक अखबार में पटाखों के विज्ञापन न आएं और विज्ञापन के फलस्वरूप जुड़ते आंकड़े जैसे किसी बीमारी का चलन,किसी का बहरा जो जाना,या हाई बीपी का शिकार होना या फिर जले कटे का निशान अखबार में पहले पन्ने पर प्रकाशित होना, तब तक दिवाली की मिठाईयां पचेंगी कैसे?
गुजिया की मिठास और लक्ष्मी पूजन के दिन पटाकों में लक्ष्मी की धज्जियां उड़ाना और अट्टहास ,त्योहारी खेल का अभिन्न अंग बन गया है! बिना पट- पट करते मसाला पाउडर के रोल और बंदूकों में गोलियों की तरह भरते नज़ारे, पुलिस अधिकारी बनने की बाल इच्छा और त्योहारों में अच्छाई बुराई की लड़ाई में शामिल होने का एक बाल मनुहार प्रयास सी लगती है। अंदर का रावण भी बाहर के रावण को जला कर सुख पाता है। विज्ञान के प्रगति का द्योतक रॉकेट अब बच्चों की पहुंच से परे नहीं! बस हनुमान की पूंछ की तरह एक छोर जलानी है , सीधा आकाश में श्या...आऊं !और 💥 बूम! बस मानो अगले वैज्ञानिक यही रॉकेट वाले ही बनेंगे। अनार की दानों की तरह बिखरे जले मसाले,चकरी की तरह गोल गोल घूमने के बाद फर्शों पर अपनी निशानी छोड़ जाते हैं। बीड़ी में मसाले भर के देवी लक्ष्मी ब्रांड बनाम बीड़ी बम अब होठों से उतर कर छतों के किनारे और माचिस की तिल्ली का सहारा लेती है । ज़िद्दी बीड़ी होंठ से फेफड़े नही पकड़े तो बम बन गई। आतंकवादी कही की! यह बम लक्ष्मी तो आमंत्रित नहीं करती मगर कइयों की लक्ष्मी जला देती है। और भेदती है कई परतें। कपड़ों की परत, चमड़े की परत,दीवारों की परत,परदों की परत और बड़ी दूर तक की पहुंच है - ओज़ोन की परत।
ओज़ोन की परत? जी हां! धरती को घेरती और हमें बचाती ऑक्सीजन की एक मोटी परत जिसके तले हम पल बढ़ रहे हैं और सांस ले रहे हैं। राम जी तो लक्ष्मण और सीता संग आए। और अयोध्या में खुशहाली लाए। रावण को मार गिराए! मगर हम खुद को मारने की धीमी गति के प्रयास में हैं! ना जाने किसको निमंत्रण देते हैं? अपनी मौत को या मासूम शरारत को जो हमें राम जी के आस पास भी नहीं आने दे रही। अयोध्या वासियों ने उनका स्वागत बड़े धूम धाम से किया! नगर को दीयों से जला कर जगमगा दिया। जगमग जगमग दीए तुलसी के पौधोंकी शोभा और घर के रौनक को बढ़ाते और रामगमन को प्रकाशमान करते। मगर अब दीए चाइनीज हो गए! कौन तेल जलाए और घी! वो तो फैट बढ़ाती है। और महंगाई के ज़माने में घी ! किफायती सौदा तो पटाखे और चाइनीज लाइट्स ही लगती हैं। कुम्हार भी मुश्किल में हैं! दीए अब वो प्लास्टिक के भी रखने लगा। म्यूजिकल दिए अब मंदिरों के स्टेटस हैं। लेकिन इतने किफायती लोग हॉस्पिटल के बिल में कसर पूरी करते हैं। चलिए भगवान न करे ऐसा हो! मगर उठा धुआं हमे तुरंत ना जलाता हो लेकिन बाद में त्वचा को सूर्य की बिना छनी पराबैंगनी किरणों का स्वागत करता है! त्वचा रोग और कैंसर की बड़ी संभावना महंगाई में आटा गीलाकर सकती है।
तो धर्म युद्ध के साथियों आपके ज्ञान वर्धन में शामिल एक और सूची है -तुलसी के नीचे दीया जलाने से अयोध्या वासियों ने किसका स्वागत किया? स्वाभाविक सा उत्तर है राम आगमन का! और !? ओज़ोन परत का ! ये बात शायद ही किसी को मालूम हो कि अयोध्या वासियों ने घी के दीए जला कर राम जी साथ साथ ओज़ोन परत को भी मोटा किया। कुम्हार को भी मोटा किया और बच्चों को भी । यानी स्वास्थ्य वर्धन भी और पर्यावरण का स्वागत भी !
अनजाने में ही सही, प्रदूषण का रावण जल कर हमें आनंदित करता है और ओजोन रूपी राम को भेद रहा है । ना जाने कौन सी दिवाली मना रहे है?
हम किसका स्वागत कर रहे है - प्रदूषण

ज्ञानवर्धक प्रसंग
जवाब देंहटाएंJi धन्यवाद
हटाएंमौजूदा समय की माँग है इसपर ध्यान देने की आवश्यकता है❤
जवाब देंहटाएंसमय- समय पर आप इस तरह की जानकारी देने के लिए धन्यवाद
जवाब देंहटाएंबेहतरीन
जवाब देंहटाएंJi शुक्रिया
हटाएंDiivali jarur mnaye par sweets ke sath patakho ko na chalaye. Jai shree ram
जवाब देंहटाएंJi bilkul
हटाएंसमय यात्रा
जवाब देंहटाएं